vichar dhara
रविवार, 19 दिसंबर 2010
हमे समझ में नहीं आ रहा है की
ऐसी क्या गुस्थाकी हो जाती है ,
कोई किसिको समझ ना ही ना चाहता हो
या फिर कोई ऐसा बदलाव ?
की सामनेवाले को कह न सको ,
और उसपर पूरी भड़ास निकलता हो
कितनी गलत बात है ये ,
जो आपकी कदर करता है ,
कमसे कम उसकी कदर तो होनीही चाहिए
अब बहोत ही मुश्किल हो जाती है ,
जिस पर गुजरती है
अपने इस सन्मान को खोते हुए
क्या गुजर रही होगी उसपर ,
फिर भी वो कुछ नहीं चाहता है
बस सबका भला चाहता है ।
लेकिन कभी किसीने उसके बारेमे सोचा है ?
वो ये घूंट कैसे निगल रहा है
ऐसी क्या गुस्थाकी हो जाती है ,
कोई किसिको समझ ना ही ना चाहता हो
या फिर कोई ऐसा बदलाव ?
की सामनेवाले को कह न सको ,
और उसपर पूरी भड़ास निकलता हो
कितनी गलत बात है ये ,
जो आपकी कदर करता है ,
कमसे कम उसकी कदर तो होनीही चाहिए
अब बहोत ही मुश्किल हो जाती है ,
जिस पर गुजरती है
अपने इस सन्मान को खोते हुए
क्या गुजर रही होगी उसपर ,
फिर भी वो कुछ नहीं चाहता है
बस सबका भला चाहता है ।
लेकिन कभी किसीने उसके बारेमे सोचा है ?
वो ये घूंट कैसे निगल रहा है
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